Two Finger Test पर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सभी अस्पतालों में लगाने को कहा पूर्ण प्रतिबंध

 , नई दिल्ली/रांची: महिलाओं की गरिमा और निजता की रक्षा को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में विवादित टू-फिंगर टेस्ट (Two Finger Test) को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए। साथ ही स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई डॉक्टर या पैरामेडिकल कर्मचारी इस परीक्षण को करता पाया जाता है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी और इसे पेशेवर कदाचार माना जाएगा।

यह फैसला रेप पीड़िताओं के संरक्षण और पुनर्वास से जुड़ी एक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आया है। अदालत ने कहा कि यौन हिंसा की शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया किसी भी स्थिति में उनके सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य को और अधिक नुकसान पहुंचाने वाली नहीं होनी चाहिए।

क्या है Two Finger Test?

टू-फिंगर टेस्ट, जिसे हिंदी में कौमार्य परीक्षण भी कहा जाता है, ब्रिटिश काल से चली आ रही एक विवादास्पद चिकित्सकीय प्रक्रिया है। इस जांच में डॉक्टर पीड़िता की योनि में दो उंगलियां डालकर यह अनुमान लगाने की कोशिश करते थे कि महिला पहले से यौन संबंधों की आदी है या नहीं।

इस प्रक्रिया का आधार यह धारणा थी कि योनि की मांसपेशियों की स्थिति या हाइमन (कौमार्य झिल्ली) के आधार पर किसी महिला की यौन गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। हालांकि चिकित्सा विज्ञान और महिला अधिकार संगठनों ने लंबे समय से इस धारणा को गलत और अवैज्ञानिक बताया है।

क्यों है यह परीक्षण विवादित?

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • यह परीक्षण वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय नहीं है।
  • इससे दुष्कर्म की पुष्टि या खंडन नहीं किया जा सकता।
  • यह पीड़िता की निजता और गरिमा का उल्लंघन करता है।
  • मानसिक रूप से पहले से आहत महिला को दोबारा प्रताड़ना झेलनी पड़ती है।
  • यह महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ माना जाता है।

झारखंड हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि दुष्कर्म पीड़िताओं को न्याय की प्रक्रिया में संवेदनशीलता और सम्मान मिलना चाहिए।

अदालत ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए:

1. Two Finger Test पर पूर्ण प्रतिबंध

राज्य सरकार को सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में इस जांच पद्धति को पूरी तरह बंद करने का निर्देश दिया गया।

2. दोषी डॉक्टरों पर कार्रवाई

यदि कोई चिकित्सक या पैरामेडिकल कर्मचारी यह परीक्षण करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई होगी और इसे पेशेवर कदाचार माना जाएगा।

3. जीरो एफआईआर को प्राथमिकता

अदालत ने कहा कि यौन अपराध के मामलों में पहले जीरो एफआईआर दर्ज की जाए और बाद में संबंधित थाने को स्थानांतरित किया जाए। नियमों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।

4. मेडिकल जांच में देरी नहीं

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की मेडिकल जांच और बयान दर्ज करने में देरी अस्वीकार्य है। इसके लिए प्रशासन और पुलिस को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं।

5. मीडिया को भी निर्देश

प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि किसी भी परिस्थिति में दुष्कर्म पीड़िता की पहचान या नाम सार्वजनिक नहीं किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट भी लगा चुका है रोक

टू-फिंगर टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई बार अपनी कड़ी आपत्ति जता चुका है।

2013 का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में कहा था कि रेप पीड़िता पर किया जाने वाला टू-फिंगर टेस्ट उसकी गरिमा, सम्मान और निजता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने इसे असंवैधानिक और अमानवीय बताया था।

2022 में फिर दोहराया रुख

साल 2022 में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने भी इस परीक्षण की कड़ी आलोचना की थी। अदालत ने कहा था कि यह प्रक्रिया वैज्ञानिक आधार से रहित है और इसे मेडिकल शिक्षा के पाठ्यक्रम से भी हटाया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि मेडिकल पेशेवरों को इस विषय पर संवेदनशील बनाया जाए ताकि भविष्य में ऐसी अमानवीय प्रक्रियाओं का इस्तेमाल न हो।

महिलाओं की गरिमा और न्याय के लिए अहम कदम

झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया पर रोक नहीं है, बल्कि महिलाओं की गरिमा, निजता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रेप पीड़िताओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया में ऐसी पुरानी और अवैज्ञानिक पद्धतियों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य पीड़िता को सम्मान और सुरक्षा प्रदान करना है, न कि उसे दोबारा मानसिक पीड़ा देना।

निष्कर्ष

ब्रिटिश काल की विरासत मानी जाने वाली टू-फिंगर टेस्ट जैसी प्रथाएं आधुनिक भारत की संवेदनशील और वैज्ञानिक न्याय व्यवस्था में अब स्वीकार्य नहीं हैं। झारखंड हाईकोर्ट का ताजा फैसला इस दिशा में एक मजबूत संदेश देता है कि महिलाओं के सम्मान और अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। अब आवश्यकता है कि देशभर में इस आदेश की भावना के अनुरूप कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि न्याय की प्रक्रिया स्वयं पीड़िता के लिए एक और सजा न बन जाए।