रांची: हूल दिवस के अवसर पर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन एवं विधायक कल्पना सोरेन ने सोमवार को राजधानी रांची के मोरहाबादी स्थित सिदो-कान्हू उद्यान पहुंचकर हूल विद्रोह के महानायक अमर वीर शहीद सिदो-कान्हू मुर्मू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठनों के सदस्य, अधिकारी और आम नागरिक मौजूद रहे।

श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि हूल दिवस भारतीय इतिहास का एक ऐतिहासिक दिन है, जब शोषण और अन्याय के विरुद्ध आदिवासी समाज ने संगठित होकर संघर्ष का बिगुल फूंका था। उन्होंने कहा कि उस दौर में देश के शोषित और वंचित वर्गों के पास अन्याय के खिलाफ लड़ने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था, तब आदिवासी समाज के वीर सपूतों ने आगे बढ़कर संघर्ष का नेतृत्व किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अमर शहीद सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और वीरांगना फूलो-झानो ने परिणाम की चिंता किए बिना अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका। उनका बलिदान केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

उन्होंने कहा कि आज भी दुनिया में जब भी कहीं कमजोर और वंचित वर्गों पर अत्याचार होता है, तो उसके विरुद्ध संघर्ष और परिवर्तन की शुरुआत होती है। यही हूल विद्रोह का सबसे बड़ा संदेश है। उन्होंने कहा कि इन महान वीर सपूतों की वजह से ही झारखंड को वीरों की धरती के रूप में जाना जाता है और राज्य का गौरवशाली इतिहास आज भी लोगों को प्रेरित करता है।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि “क्रांति की आग कभी बुझती नहीं है और न ही इसे बुझाया जा सकता है। क्रांति की चिंगारी सदैव जलती रहती है।” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि देश के कई राष्ट्रीय स्मारकों, जैसे राजघाट और इंडिया गेट पर निरंतर जलने वाली ज्योति इसी अमर बलिदान और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि झारखंड की पावन भूमि का इतिहास वीरों के अदम्य साहस और बलिदान से भरा हुआ है। राज्य में समय-समय पर महापुरुषों को याद कर उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया जाता है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे शहीदों के संघर्ष, त्याग और विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाएं, ताकि समाज में न्याय, समानता और स्वाभिमान की भावना लगातार मजबूत होती रहे।
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री और विधायक कल्पना सोरेन ने उपस्थित लोगों के साथ मिलकर अमर वीर शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किए। पूरे परिसर में हूल विद्रोह के महानायकों के सम्मान में श्रद्धा, गौरव और देशभक्ति का वातावरण देखने को मिला।
क्या है हूल दिवस?
हर वर्ष 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1855 में संथाल परगना से शुरू हुए हूल विद्रोह का नेतृत्व सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और वीरांगना फूलो-झानो ने किया था। यह विद्रोह अंग्रेजी शासन, जमींदारी व्यवस्था और महाजनी शोषण के खिलाफ भारतीय इतिहास के सबसे बड़े जनआंदोलनों में से एक माना जाता है। झारखंड में इस दिन विभिन्न स्थानों पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित कर वीर शहीदों के संघर्ष और बलिदान को याद किया जाता है।