रांची: देवभाषा संस्कृत, जिसे भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की आधारशिला माना जाता है, झारखंड में आज गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। एक समय वेद, उपनिषद और पुराणों की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित संस्कृत अब संसाधनों की कमी, शिक्षकों के अभाव और घटती छात्र संख्या के कारण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती नजर आ रही है।
राज्य में कई मान्यता प्राप्त संस्कृत विद्यालय वर्षों से आधारभूत सुविधाओं और पर्याप्त शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। झारखंड में संस्कृत विद्यालयों को मान्यता देने की व्यवस्था मौजूद है और इन्हें शैक्षणिक ढांचे का हिस्सा माना जाता है, लेकिन इनके सुदृढ़ीकरण की मांग लगातार उठती रही है।
संस्कृत शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि समय रहते रिक्त पदों पर नियुक्तियां नहीं हुईं और विद्यालयों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए, तो आने वाले वर्षों में संस्कृत शिक्षा और अधिक कमजोर हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि संस्कृत केवल धार्मिक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, साहित्य और व्याकरण की समृद्ध विरासत का आधार है। इसलिए इसका संरक्षण सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के समान है।
शिक्षाविदों का सुझाव है कि राज्य सरकार संस्कृत विद्यालयों में शिक्षकों की नियमित नियुक्ति, डिजिटल शिक्षा संसाधनों की उपलब्धता, छात्रवृत्ति और जनजागरूकता अभियान जैसे कदम उठाए। इससे नई पीढ़ी को संस्कृत अध्ययन के प्रति आकर्षित किया जा सकेगा।
झारखंड में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार विभिन्न कार्यक्रम चला रही है, लेकिन संस्कृत शिक्षा को भी समान प्राथमिकता दिए जाने की मांग लगातार उठ रही है।