झारखंड का ‘शाकाहारी मटन’ फिर बाजार में छाया, ₹1200 किलो तक बिक रहा रुगड़ा, जल्द मिल सकता है GI Tag

रांची: मानसून की पहली बारिश के साथ ही झारखंड के जंगलों से निकलने वाला मशहूर वन उत्पाद रुगड़ा एक बार फिर बाजारों की रौनक बन गया है। स्वाद में मटन और चिकन जैसा होने के कारण इसे ‘शाकाहारी मटन’ या ‘शाकाहारी चिकन’ कहा जाता है। रांची समेत पूरे छोटानागपुर क्षेत्र की मंडियों में इसकी कीमत 1000 से 1200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। सीमित समय के लिए मिलने वाला यह दुर्लभ खाद्य पदार्थ अब GI (Geographical Indication) Tag मिलने की उम्मीदों को लेकर भी चर्चा में है।

आखिर क्या है रुगड़ा?

रुगड़ा एक विशेष प्रकार का जंगली फंगस (Wild Mushroom) है, जो केवल प्राकृतिक परिस्थितियों में ही विकसित होता है। झारखंड के कई इलाकों में इसे ‘पुटू’ नाम से भी जाना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे आज तक वैज्ञानिक तरीके से खेतों में उगाया नहीं जा सका है। यह पूरी तरह प्रकृति की देन है और सिर्फ मानसून की शुरुआत में जंगलों में स्वतः उगता है।

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व्यावसायिक खेती आज भी संभव नहीं

रुगड़ा की खेती आज भी संभव नहीं हो सकी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह फंगस पेड़ों की जड़ों के साथ माइकोराइज़ा (Mycorrhiza) नामक प्राकृतिक संबंध बनाकर विकसित होता है। इसलिए इसे खेतों में कृत्रिम रूप से उगाना बेहद कठिन माना जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की पहली बारिश, वातावरण में बढ़ी नमी, मिट्टी का तापमान और प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रियाएं मिलकर इसके बीजाणुओं को सक्रिय करती हैं। इसके बाद यह धीरे-धीरे मिट्टी के भीतर गोल आकार में विकसित होने लगता है।

सखुआ के जंगलों में सबसे अधिक मिलता है

रुगड़ा मुख्य रूप से सखुआ (साल) के पेड़ों की जड़ों के आसपास पाया जाता है। झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र की लाल, हल्की रेतीली और पथरीली मिट्टी इसके विकास के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

वर्षों से गिरे हुए सूखे पत्तों के सड़ने से मिट्टी में बनने वाला प्राकृतिक जैविक पदार्थ और पर्याप्त नमी इसकी अच्छी पैदावार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि मिट्टी में नमी जरूरी होती है, लेकिन जलभराव होने पर इसका विकास प्रभावित हो जाता है।

जमीन के नीचे आलू की तरह उगता है

रुगड़ा जमीन के ऊपर दिखाई नहीं देता। यह मिट्टी की सतह से लगभग 2 से 3 इंच नीचे आलू या कंचे जैसी गोल आकृति में बनता है। जब इसका आकार बढ़ने लगता है, तब जमीन की ऊपरी सतह पर हल्की दरारें दिखाई देती हैं।

जंगलों का अनुभव रखने वाले स्थानीय ग्रामीण और आदिवासी इन्हीं दरारों को पहचानकर लकड़ी की सहायता से बेहद सावधानीपूर्वक रुगड़ा निकालते हैं, ताकि वह टूटे नहीं।

सफेद और काला, दोनों की अलग पहचान

झारखंड में मिलने वाला रुगड़ा मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—सफेद और काला।

सफेद रुगड़ा

  • अंदर से पूरी तरह सफेद और सख्त।
  • स्वाद सबसे बेहतर माना जाता है।
  • बाजार में इसकी कीमत सबसे अधिक होती है।

काला रुगड़ा

  • अपेक्षाकृत अधिक परिपक्व होता है।
  • अंदर का भाग काला या मटमैला दिखाई देता है।
  • इसकी बनावट थोड़ी नरम होती है और कीमत भी कम रहती है।

सिर्फ 20–25 दिनों का होता है सीजन

रुगड़ा का सीजन बेहद छोटा होता है। मानसून की पहली बारिश के बाद लगभग 20 से 25 दिनों तक ही यह जंगलों में मिलता है। जैसे-जैसे बारिश तेज होती जाती है और सावन आगे बढ़ता है, इसकी उपलब्धता तेजी से कम हो जाती है।

यही वजह है कि हर साल जून और जुलाई में रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा, चाईबासा और आसपास के बाजारों में इसकी भारी मांग रहती है।

सुबह-सुबह आदिवासी समुदाय जंगलों से रुगड़ा एकत्र कर स्थानीय हाट और मंडियों तक पहुंचाते हैं, जहां कुछ ही घंटों में पूरा स्टॉक बिक जाता है।

क्यों कहा जाता है ‘शाकाहारी मटन’?

रुगड़ा पकने के बाद इसकी बनावट और स्वाद काफी हद तक मटन और चिकन जैसा महसूस होता है। यही कारण है कि इसे झारखंड में ‘शाकाहारी मटन’ या ‘वेजिटेरियन चिकन’ के नाम से जाना जाता है।

बरसात शुरू होते ही लोग पूरे साल इसके आने का इंतजार करते हैं और ऊंची कीमत होने के बावजूद इसे खरीदने से पीछे नहीं हटते।

पोषण से भरपूर है रुगड़ा

रुगड़ा सिर्फ स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि पोषण के लिए भी जाना जाता है। इसमें कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिनमें शामिल हैं—

  • उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन
  • विटामिन C
  • विटामिन B कॉम्प्लेक्स
  • विटामिन B12
  • फोलिक एसिड
  • कैल्शियम
  • फॉस्फोरस
  • पोटैशियम
  • तांबा (Copper)
  • विटामिन D

इन पोषक तत्वों के कारण इसे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला खाद्य पदार्थ भी माना जाता है।

क्या वास्तव में कैंसर और अस्थमा में फायदेमंद है?

स्थानीय लोगों और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार रुगड़ा का उपयोग कई औषधीय उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कि यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।

हालांकि कैंसर, अस्थमा या अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज या रोकथाम में इसकी प्रभावशीलता को लेकर अभी पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसे किसी भी बीमारी की दवा मानने के बजाय एक पौष्टिक खाद्य पदार्थ के रूप में ही देखा जाना चाहिए और चिकित्सा संबंधी सलाह के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

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जल्द मिल सकता है GI Tag

रुगड़ा झारखंड की पहचान बन चुका है। इसकी विशिष्ट गुणवत्ता, प्राकृतिक उत्पादन और क्षेत्रीय पहचान को देखते हुए इसे Geographical Indication (GI) Tag दिलाने की दिशा में प्रयास जारी हैं। यदि इसे GI टैग मिलता है तो इससे झारखंड की इस अनोखी वन उपज को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी, साथ ही स्थानीय आदिवासी समुदायों और वन उत्पाद संग्राहकों को भी आर्थिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ेगी.

The Varta Insight

रुगड़ा सिर्फ एक मौसमी सब्जी नहीं, बल्कि झारखंड की जैव विविधता, आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक संपदा का अनमोल प्रतीक है। साल में कुछ ही दिनों के लिए मिलने वाला यह दुर्लभ वन उत्पाद स्वाद, पोषण और पारंपरिक विरासत—तीनों का अद्भुत संगम है। यही कारण है कि हर मानसून में इसकी मांग और कीमत दोनों नई ऊंचाइयों पर पहुंच जाती हैं।

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