US-Iran Peace agreement: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दोनों देशों के बीच संबंधों को नई दिशा देने का प्रयास किया है।
फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान वर्साय के ऐतिहासिक महल में यह अहम घटनाक्रम सामने आया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा आयोजित विशेष डिनर के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने समझौते की हार्ड कॉपी पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान मौजूद अंतरराष्ट्रीय नेताओं और मेहमानों ने तालियां बजाकर इस पहल का स्वागत किया।
समझौते से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें ट्रंप को डिनर टेबल पर दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते हुए देखा जा सकता है। बताया जा रहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच महीनों तक चली बातचीत के बाद यह समझौता संभव हो सका है, जिसे दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, समझौते के मसौदे में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं। इनमें ईरान के उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम को नियंत्रित करने के लिए नया न्यूनतम मानक तय करना प्रमुख है। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य से 60 दिनों तक बिना किसी शुल्क के जहाजों के आवागमन की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि भविष्य में शुल्क लगाने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है।
समझौते में लेबनान में हिज्बुल्लाह से जुड़े हालिया घटनाक्रमों के बाद क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रावधान भी शामिल बताए जा रहे हैं। इसके बदले अमेरिका ईरान पर लगाए गए कुछ प्रमुख प्रतिबंधों में राहत देने की दिशा में कदम उठाएगा, हालांकि सभी प्रतिबंधों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाएगा।
जानकारी के अनुसार, ट्रंप और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने समझौते पर पहले डिजिटल हस्ताक्षर किए थे। औपचारिक हस्ताक्षर समारोह शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित था, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने वर्साय में मौजूद रहते हुए ही इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित औपचारिक समारोह की पुष्टि की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो इससे न केवल अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में सुधार होगा, बल्कि मध्य पूर्व क्षेत्र में स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।