रांची: झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। वरिष्ठ आदिवासी नेता बंधु तिर्की ने राज्य की 9 जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को संरक्षित करने और उन्हें शिक्षा, प्रशासन तथा सामाजिक जीवन में सम्मानजनक स्थान दिलाने की मांग उठाई है।
उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि किसी समाज की पहचान, संस्कृति, इतिहास और परंपराओं की सबसे बड़ी धरोहर होती है। यदि समय रहते इन भाषाओं के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो सकती हैं।
भाषाओं के संरक्षण की जरूरत पर दिया जोर
बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड अपनी सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के लिए पूरे देश में जाना जाता है। यहां बोली जाने वाली जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं राज्य की पहचान हैं। इन भाषाओं को केवल बोलचाल तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, सरकारी कामकाज और सामाजिक गतिविधियों में भी उचित स्थान मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब तक मातृभाषाओं को संस्थागत समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक उनका विकास और संरक्षण संभव नहीं है।
नई पीढ़ी तक पहुंचानी होगी भाषाई विरासत
उन्होंने चिंता जताई कि आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण युवा पीढ़ी अपनी मातृभाषाओं से दूर होती जा रही है। यदि यह स्थिति बनी रही तो कई भाषाएं धीरे-धीरे विलुप्त होने के खतरे में आ सकती हैं।
बंधु तिर्की का कहना है कि स्कूलों में मातृभाषा आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चे अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहें।
शिक्षा और प्रशासन में मिले स्थान
उन्होंने मांग की कि झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक कार्यों और शिक्षा व्यवस्था में अधिक महत्व दिया जाए। इससे न केवल भाषाओं का संरक्षण होगा, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों तक सरकारी योजनाओं की जानकारी भी उनकी अपनी भाषा में पहुंच सकेगी।
भाषा ही संस्कृति की पहचान
बंधु तिर्की ने कहा कि किसी भी समाज की भाषा उसके इतिहास, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का आईना होती है। भाषा के कमजोर होने का सीधा असर संस्कृति पर पड़ता है। इसलिए भाषाओं को बचाना केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का भी विषय है।
उन्होंने समाज के लोगों से भी अपनी मातृभाषा के अधिक से अधिक प्रयोग और नई पीढ़ी को इसे सिखाने की अपील की।
सरकार से प्रभावी नीति बनाने की मांग
बंधु तिर्की ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक नीति बनाई जाए। साथ ही इन भाषाओं में अध्ययन सामग्री, साहित्य, डिजिटल कंटेंट और शोध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं शुरू की जाएं।
निष्कर्ष
झारखंड की भाषाई विरासत को बचाने की यह मांग केवल भाषाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान और आदिवासी परंपराओं को संरक्षित रखने का प्रयास भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कई पारंपरिक भाषाएं धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो सकती हैं। ऐसे में सरकार, समाज और शैक्षणिक संस्थानों की साझा जिम्मेदारी बनती है कि वे इन भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रभावी पहल करें।
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